भारत

तिरंगे की व्यथा….

प्रभात संवाद, कोटा @ देवदत्त पालीवाल “निर्भय”

तिरंगे की व्यथा
है शान तुम्हारी हम से ही,
सदा हमनें ही मान बढ़ाया है !
जब जब संकट तुम पर आया,
तब हमने ही तुम्हें बचाया है !!

अरि दल में तुम जब फंसे मिले,
तब हमने ही तुम्हें बचाया था !
था मिला तुम्हें तब नूतन जीवन,
हमने निज फ़र्ज निभाया था !!

तुम फहराते हो मुझे सदा मगर,
क्या निज वादों पर भी खरे रहे !
है राष्ट्र प्रथम निज स्वार्थ नहीं,
इस पर तुम कितने अडिग रहे !!

कर में लेकर तुम संविधान को,
सदा झूठी कसमें क्यो खाते हो !
तुम्हें सत्ता का लालच रहा सदा,
इसलिए आज छटपटाते हो !!

तुम रहे समर्थक कुटिलों के,
आतंक समर्थित कार्य किये !
तुमने बोए नफ़रत के बीज सदा,
और विपरीत देश के कार्य किये !!

है उर में सच्चा प्रेम अगर,
तो ही तुम मुझको फहराना !
पहले इसको तुम सिद्ध करो,
तब ही कर मुझको लगाना !!

यदि करने हैं तोअच्छे कार्य करो,
बरना मत मुझको नीचा दिखलाओ !
है रक्त अगर भारत माँ का तुममें,
तो ही तुम मुझको फहराओ !!

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