ओपिनियन

शिक्षा, समाज और सच की आवाज : एक चिंतन

“जिन किताबों में हम गुम हुए,
आज उन्हीं अक्षरों से हम तबाह हुए…
सोचा था ज़माना बदल देंगे,
पर हम खुद ही खुद से बेगाने हुए।”

ये पंक्तियाँ मात्र भावनाएँ नहीं, बल्कि एक शिक्षित व्यक्ति की गहरी पीड़ा और आत्ममंथन को दर्शाती हैं। आज का भारत विकास की ओर अग्रसर होने का दावा करता है, “विकसित भारत 2047” के सपनों को सजाता है, परंतु जब हम 2026 की वास्तविकताओं पर दृष्टि डालते हैं, तो कई सवाल हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियाँ प्राप्त करना रह गया है? क्या हमने शिक्षा को केवल रोजगार और पद प्राप्ति का साधन बना दिया है, या वह समाज को दिशा देने, सत्य के पक्ष में खड़े होने और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का माध्यम भी है?
विडंबना यह है कि आज एक शिक्षित, योग्य और लोक सेवा आयोग से चयनित व्यक्ति को भी कई बार एक अशिक्षित नेतृत्व के अधीन कार्य करना पड़ता है। इससे न केवल उसकी क्षमता बाधित होती है, बल्कि व्यवस्था में एक असंतुलन भी उत्पन्न होता है। यदि शिक्षा का यही परिणाम है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?
समाज के कुछ आदिवासी या पारंपरिक समुदायों में आज भी आपसी सहयोग, स्पष्ट नियम, निस्वार्थ भावना और न्यायपूर्ण दंड व्यवस्था देखने को मिलती है। वहाँ व्यक्ति की गरिमा और समुदाय की एकता को प्राथमिकता दी जाती है। इसके विपरीत, तथाकथित “विकसित” समाज में व्यक्ति अक्सर अकेला, असुरक्षित और दबा हुआ महसूस करता है।
आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सत्ता और धन का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है। नेता अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं, जबकि गरीब जनता इसे अपना भाग्य मानकर मौन धारण कर लेती है। जो लोग आवाज उठाते हैं, उन्हें अक्सर झूठे आरोपों, जांचों और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। सच बोलना आज भी जोखिम भरा है “सच जेल में है और झूठ मज़े में।”
यह स्थिति केवल राजनीतिक या प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना के कमजोर होने का परिणाम भी है। शिक्षित वर्ग, जो समाज का मार्गदर्शक होना चाहिए, अक्सर मौन रहता है—या तो भय के कारण, या फिर स्वार्थ के कारण।
आज जब हम वैश्विक स्तर पर प्रगति की बात करते हैं, तब भी हम धर्म, जाति और संकीर्ण विचारों में बंटे हुए हैं। जहाँ नए विचारों, नवाचार और समावेशिता की आवश्यकता है, वहाँ हम पुरानी धारणाओं में उलझे हुए हैं।
समाधान क्या है?
समाधान शिक्षा में ही निहित है—परंतु केवल साक्षरता नहीं, बल्कि जागरूकता, नैतिकता और साहस की शिक्षा। शिक्षित वर्ग को आगे आना होगा, संगठित होना होगा और समाज के लिए नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी। सच के लिए आवाज उठाना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।
यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी इसी अन्याय और असमानता के चक्र में फँसी रहेंगी।
आइए, हम अपने भीतर के डर को त्यागकर, सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े हों। अपने और अपने अपनों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए, एक जागरूक, संगठित और सशक्त समाज का निर्माण करें।


डॉ. सरोज जाखड़
समाजशास्त्री एवं लेखिका

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