न्यायाधीशों को जयपुर पीठ से जोधपुर मुख्यपीठ भेजे जाने पर बार एसोसिएशन ने जताई आपत्ति
जयपुर, 05 अक्टूबर। राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ से न्यायाधीशों को मुख्यपीठ जोधपुर भेजे जाने के आदेशों पर राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन, जयपुर ने आपत्ति जताई है।
बार एसोसिएशन ने राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजय कुमार अग्रवाल को पत्र भेजकर तीन अक्टूबर को जारी आदेशों पर पुनर्विचार करने और आवश्यकता होने पर इन्हें वापस लेने अथवा फिलहाल स्थगित रखने का अनुरोध
किया है।
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव सोगरवाल और महासचिव दीपेश शर्मा ने पत्र में कहा है कि दोनों पीठों पर न्यायाधीशों की संख्या में संतुलन बनाने का उद्देश्य समझ में आता है, लेकिन केवल न्यायाधीशों की संख्या बराबर करना वास्तविक न्यायिक कार्यभार की समानता नहीं माना जा सकता। एसोसिएशन का कहना है कि जयपुर पीठ पर लंबित मामलों की संख्या जोधपुर की तुलना में काफी अधिक है। ऐसे में जयपुर से न्यायाधीशों की संख्या कम करने से मामलों के निस्तारण की गति प्रभावित होने की आशंका है।
बार के अनुसार तीन अक्टूबर को जारी आदेशों के तहत न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति चंद्र प्रकाश श्रीमाली को पांच अक्टूबर से अगले आदेश तक जोधपुर मुख्यपीठ में बैठने के लिए नामित किया गया है। एक अन्य आदेश के तहत न्यायमूर्ति मनीष शर्मा को पांच अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक जोधपुर में बैठने के लिए नामित किया गया है। इसके अलावा न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता को पहले से जारी अलग आदेश के तहत जोधपुर में बैठने के लिए नामित किया गया है।
एसोसिएशन ने बताया कि वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जयपुर पीठ में 22 न्यायाधीश और जोधपुर में 15 न्यायाधीश कार्यरत हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के बाद जयपुर में न्यायाधीशों की संख्या घटकर 19 और जोधपुर में बढ़कर 18 हो जाएगी।
बार एसोसिएशन ने उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध 30 सितंबर तक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उच्च न्यायालय में कुल छह लाख 82 हजार 946 मामले लंबित हैं। इनमें जयपुर पीठ में तीन लाख 90 हजार 423 और जोधपुर में दो लाख 92 हजार 523 मामले लंबित हैं। यानी कुल लंबित मामलों में जयपुर पीठ की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत है और यहां जोधपुर की तुलना में करीब 98 हजार अधिक मामले लंबित हैं।
एसोसिएशन के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर जयपुर में प्रत्येक न्यायाधीश पर औसतन करीब 20 हजार 500 लंबित मामलों का भार आएगा, जबकि जोधपुर में यह करीब 16 हजार 250 मामले प्रति न्यायाधीश होगा। ऐसे में न्यायाधीशों की संख्या को बराबर करने के बावजूद वास्तविक कार्यभार का अंतर बना रहेगा।

