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लाइन में आम आदमी, सुविधा में खास लोग: क्या हम सच में 1947 से आगे बढ़ पाए हैं?

@ शेखर झा । भारत में एक दृश्य बहुत आम है—लंबी लाइनें। कभी राशन की, कभी अस्पताल की, कभी टिकट की, कभी गैस की, तो कभी किसी सरकारी योजना की। इन लाइनों में खड़े लोग लगभग हमेशा एक जैसे होते हैं मजदूर, किसान, छोटे कर्मचारी, बुजुर्ग, महिलाएं, छात्र। यानी वही आम आदमी जिसके नाम पर राजनीति होती है।

लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि इन लाइनों में कोई मंत्री, बड़ा अधिकारी या बड़ा उद्योगपति खड़ा हो? शायद ही कभी। यही सवाल बार-बार दिमाग में घूमता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

लाइन का सच और व्यवस्था की दूरी

दरअसल, लाइन सिर्फ भीड़ का प्रतीक नहीं है, यह व्यवस्था और नागरिक के बीच की दूरी का भी प्रतीक है। आम आदमी को हर छोटी-बड़ी सुविधा पाने के लिए इंतजार करना पड़ता है घंटों, कई बार दिनों तक।

लेकिन दूसरी तरफ सत्ता और संपन्नता के गलियारों में रहने वाले लोगों के लिए लगभग हर काम का एक अलग रास्ता होता है—सीधा, तेज और बिना इंतजार वाला।

यहीं से वह असमानता पैदा होती है जिसे हम अक्सर महसूस तो करते हैं, लेकिन खुलकर पूछ नहीं पाते।

सवाल पूछना क्यों कठिन हो जाता है?

हमारे समाज में अक्सर यह माहौल बना दिया जाता है कि सवाल पूछना ही गलत है
अगर कोई नागरिक व्यवस्था पर सवाल उठाए, तो उसे तुरंत कई खानों में बांट दिया जाता है कभी विरोधी, कभी असंतुष्ट, कभी नकारात्मक सोच वाला।

लेकिन सच यह है कि लोकतंत्र सवालों पर ही टिका होता है
अगर नागरिक सवाल नहीं पूछेंगे, तो व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश कैसे बनेगी?

हर बार नए शिलान्यास, लेकिन समस्याएं वही

आज खबर है कि प्रधानमंत्री असम में हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का शिलान्यास करने जा रहे हैं। यह सुनने में अच्छा लगता है। देश में विकास होना चाहिए, नई योजनाएं आनी चाहिए।

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि हर बार इतने बड़े शिलान्यास के बाद भी आम आदमी की बुनियादी समस्याएं क्यों जस की तस दिखती हैं?

  • कई जगहों पर आज भी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं
  • परिवहन व्यवस्था कमजोर है
  • युवाओं के लिए स्थायी रोजगार की कमी है
  • और अब गैस और तेल की कीमतें भी आम घरों का बजट बिगाड़ रही हैं

ऐसे में आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम सच में उस स्थिति से बहुत आगे बढ़ पाए हैं, जिसे हमने 1947 में पीछे छोड़ने का सपना देखा था?

विकास का असली अर्थ क्या है?

विकास सिर्फ बड़े-बड़े मंचों से घोषित योजनाओं या शिलान्यासों से नहीं मापा जा सकता। असली विकास तब दिखाई देता है जब

  • अस्पताल में इलाज के लिए लाइन छोटी हो जाए
  • नौकरी के लिए युवा भटकना बंद कर दें
  • आम आदमी को किसी सुविधा के लिए सिफारिश या जुगाड़ की जरूरत न पड़े

जब तक यह बदलाव जमीन पर नहीं दिखता, तब तक आम आदमी के मन में सवाल उठते रहेंगे।

आखिर कब खत्म होगी यह दूरी?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संविधान ने हर नागरिक को बराबरी का अधिकार दिया है। लेकिन अगर व्यवस्था और आम नागरिक के बीच की दूरी लगातार बनी रहती है, तो यह चिंता का विषय है।

शायद अब समय आ गया है कि विकास के दावों के साथ-साथ उस आम आदमी की कतार को भी देखा जाए, जो हर दिन धूप, धूल और उम्मीद के साथ लाइन में खड़ा रहता है।

क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत वही है—
जो लाइन में खड़ा है, लेकिन उम्मीद अभी भी नहीं छोड़ी है।

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