समानता की राह: अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों की भी समझ
जयपुर, 3 अक्टूबर @ डॉ. किरण देवल “एक कचौरी, दो समोसे, इन मर्दों का क्या भरोसा…” जैसे नारों के साथ होने वाले विरोध-प्रदर्शन आज महिलाओं की सुरक्षा और लैंगिक समानता को लेकर समाज में चल रही बहस का हिस्सा बन गए हैं। ऐसे नारों के पीछे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना को समझना आवश्यक है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी विचारणीय है कि क्या केवल विरोध-प्रदर्शन और नारों से महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है?
निश्चित रूप से नहीं।
महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न केवल किसी एक लिंग के विरुद्ध नारों का विषय नहीं है। यह कानून-व्यवस्था, सामाजिक सोच, परिवार, शिक्षा और व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। यदि किसी महिला को रात में घर से बाहर निकलने में डर लगता है, तो इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि समाज पुरुष और महिला को एक-दूसरे के विरोधी वर्ग के रूप में देखना शुरू कर दे। आवश्यकता इस बात की है कि अपराध करने वाले व्यक्ति के मन में कानून का भय हो और हर महिला को बिना भय के अपने जीवन के निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले।
हर पुरुष एक जैसा नहीं, हर महिला भी एक जैसी नहीं
समाज में अच्छे और बुरे लोग दोनों होते हैं। किसी व्यक्ति का व्यवहार केवल उसके पुरुष या महिला होने से तय नहीं होता। इसलिए किसी पूरे वर्ग को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है।
जिस प्रकार किसी महिला के साथ हुए अपराध के आधार पर सभी पुरुषों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, उसी प्रकार किसी पुरुष के गलत व्यवहार के कारण महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह भी उचित नहीं है।
समानता का वास्तविक अर्थ यही है कि व्यक्ति को उसके लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कर्मों के आधार पर देखा जाए।
क्या प्रदर्शन के बाद सुरक्षा का सवाल खत्म हो जाता है?
विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक समाज में अपनी बात रखने का एक माध्यम है। इससे जागरूकता पैदा हो सकती है और समाज का ध्यान किसी गंभीर समस्या की ओर आकर्षित किया जा सकता है। लेकिन प्रदर्शन अपने आप में समस्या का अंतिम समाधान नहीं है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, प्रभावी कानून-व्यवस्था, त्वरित शिकायत व्यवस्था, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, संवेदनशील पुलिसिंग, विद्यालयों में लैंगिक सम्मान की शिक्षा और परिवार में सही संस्कार जैसे अनेक स्तरों पर काम करना आवश्यक है।
जब तक अपराधी मानसिकता और कानून के प्रति लापरवाही पर प्रभावी रोक नहीं लगेगी, तब तक केवल नारों से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होगा।
नारीवाद का अर्थ क्या है?
नारीवाद को केवल पुरुष-विरोध के रूप में देखना भी उचित नहीं है। व्यापक अर्थ में नारीवाद महिलाओं को समान अवसर, सम्मान, अधिकार और निर्णय लेने की स्वतंत्रता दिलाने की विचारधारा है।
हर महिला का नारीवाद को समझने और व्यक्त करने का तरीका अलग हो सकता है। कोई महिला अपने अधिकारों के लिए मुखर होकर आवाज उठाती है, तो कोई परिवार और काम के बीच संतुलन बनाते हुए अपने तरीके से जीवन जीती है। दोनों के चुनावों का सम्मान होना चाहिए।
इसी तरह, किसी महिला का घरेलू जीवन चुनना उसे कम स्वतंत्र नहीं बनाता और किसी दूसरी महिला का नौकरी या सार्वजनिक जीवन चुनना उसे अधिक श्रेष्ठ नहीं बनाता। स्वतंत्रता का अर्थ चुनाव करने का अधिकार है, किसी एक जीवनशैली को दूसरे पर थोपना नहीं।
अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी
एक स्वस्थ समाज में अधिकार और जिम्मेदारियां साथ-साथ चलते हैं। महिलाओं को शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान, समान अवसर और अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। साथ ही प्रत्येक नागरिक—चाहे वह महिला हो या पुरुष—को कानून, परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए।
हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां बेटी को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की जरूरत कम से कम पड़े और बेटे को महिलाओं का सम्मान करना बचपन से ही सिखाया जाए।
हमें किस तरह का समाज बनाना है?
आज आवश्यकता महिलाओं और पुरुषों के बीच दूरी बढ़ाने की नहीं, बल्कि आपसी सम्मान बढ़ाने की है।
हमें ऐसा समाज बनाने का प्रयास करना चाहिए जहां—
- महिला बिना भय के शिक्षा और रोजगार के अवसर प्राप्त कर सके।
- वह अपनी पसंद के अनुसार जीवन के निर्णय ले सके।
- पुरुषों को केवल उनके लिंग के कारण अपराधी न माना जाए।
- अपराधी को उसके अपराध के आधार पर कानून के अनुसार दंड मिले।
- परिवार बेटियों और बेटों के पालन-पोषण में समान सम्मान और अवसर दे।
- अधिकारों के साथ कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की भी समझ विकसित हो।
- असहमति के बावजूद संवाद और सम्मान की संस्कृति बनी रहे।
किसी एक वर्ग को दोषी ठहराकर समाज में स्थायी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। परिवर्तन तब आएगा जब हम व्यक्ति को उसके लिंग से नहीं, उसके व्यवहार और विचारों से पहचानेंगे।
नारी सशक्तिकरण का उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा समाज देना होना चाहिए जिसमें वे अपने अधिकारों और अपनी स्वतंत्रता का सम्मानपूर्वक उपयोग कर सकें।
आइए, हम ऐसा समाज बनाने में अपना योगदान दें जहां न कोई दबे, न कोई दबाए; न किसी के अधिकार छीने जाएं और न किसी की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो।
समानता का अर्थ किसी एक को ऊपर उठाकर दूसरे को नीचे करना नहीं, बल्कि सभी को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना है।
डॉ. किरण देवल
सहायक आचार्य (राजनीति विज्ञान)
किरण क्रांति फाउंडेशन
(ये लेखक के अपने विचार है)
