25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से शुरू होगा चातुर्मास, चार माह तक मांगलिक कार्यों पर विराम
भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाएंगे, 26 जुलाई को व्रत पारण के बाद प्रभावी होगी शुभ कार्यों पर रोक; पूजा, जप-तप और दान का बढ़ेगा महत्व
जयपुर, 25 जुलाई । आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी इस वर्ष 25 जुलाई को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी। इस दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाएंगे। इसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होगा, जो कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी तक चलेगा। आचार्य अवधेश दाधीच ने बताया कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ) सहित सभी मांगलिक कार्य स्थगित रहेंगे।
26 जुलाई से प्रभावी होगा मांगलिक कार्यों पर विराम : आचार्य दाधीच के अनुसार द्वादशी तिथि 26 जुलाई को दोपहर 1:57 बजे समाप्त होगी। इसी दिन सुबह 6:13 बजे से 8:50 बजे के बीच व्रत का पारण किया जाएगा। इसके बाद चातुर्मास के नियम प्रभावी माने जाएंगे। उन्होंने बताया कि एकादशी तिथि 24 जुलाई सुबह 9:12 बजे से प्रारंभ होकर 25 जुलाई सुबह 11:34 बजे तक रहेगी। 25 जुलाई को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:45 से 5:29 बजे तथा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:19 से 1:11 बजे तक रहेगा।
चातुर्मास में बढ़ जाता है साधना का महत्व: धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास में शुभ संस्कारों पर विराम रहता है, लेकिन पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना गया है। श्रद्धालु इस अवधि में भगवान विष्णु की आराधना कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य पुनः आरंभ हो जाएंगे।
राजा बलि की कथा से जुड़ी है परंपरा: आचार्य अवधेश दाधीच ने बताया कि देवशयनी एकादशी का संबंध राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा है। भगवान विष्णु ने राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक का अधिपति बनाया और उनके आग्रह पर चार माह तक उनके साथ रहने का वचन दिया। इसी मान्यता के कारण भगवान विष्णु इस अवधि में योगनिद्रा में रहते हैं, जबकि सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं।

