दुनिया के देशों और संस्कृतियों को जोड़ रही है भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा : मोदी
नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं तथा दर्शन, संगीत, नृत्य, साहित्य, सिनेमा, खान-पान और त्योहारों की सांस्कृतिक विरासत आज भी दुनिया के विभिन्न देशों और संस्कृतियों को भारत से जोड़ रही है।
श्री मोदी ने बुधवार को यहां इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की ओर से विज्ञान भवन में आयोजित ‘विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक संबंध’ विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भेजे अपने संदेश में कही। उनका संदेश केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने पढ़कर सुनाया। छह दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन का उद्घाटन संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया। यह आयोजन बृहत्तर भारत परिषद् की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर किया गया है, जिसमें 50 देशों के प्रतिनिधि और राजदूत भाग ले रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि नालंदा जैसे ज्ञान केंद्रों ने भारत और एशिया के अन्य क्षेत्रों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत किया। बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, व्यापारियों और यात्रियों ने स्थल तथा समुद्री मार्गों के माध्यम से भारतीय विचारों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में योग का प्रसार इस बात का उदाहरण है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं आज भी विभिन्न देशों और संस्कृतियों को जोड़ रही हैं।
श्री मोदी ने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन में होने वाला विचार-विमर्श भारत और दुनिया के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की समझ को मजबूत करेगा तथा अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाएगा।
श्री शेखावत ने कहा कि बृहत्तर भारत को किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय दावे के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों के व्यापक क्षेत्र के रूप में समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विभिन्न सभ्यताओं के संपर्क से विचारों और ज्ञान का आदान-प्रदान होता है तथा कला को नए रूप मिलते हैं। बृहत्तर भारत परिषद् की स्थापना 14 अक्टूबर, 1926 को कलकत्ता में हुई थी।
केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि बृहत्तर भारत परियोजना के तहत भारत के प्राचीन संबंधों को प्रमाणों के आधार पर सामने लाने के लिए भारतीय और अन्य देशों के विद्वान संयुक्त रूप से शोध करेंगे। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि सभ्यताओं की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि विचारों की यात्रा, लोगों के आवागमन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से भी होती है।
सम्मेलन के दौरान ‘एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक से एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। उद्घाटन सत्र से पहले पूर्व विदेश सचिव एवं पूर्व राजदूत शशांक की अध्यक्षता में पूर्ण सत्र आयोजित हुआ, जिसमें लिथुआनिया की भारत में राजदूत डायना मिकेविचिएने, फिजी के उच्चायुक्त जगन्नाथ सामी, संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव लिली पांडेय तथा पूर्व राजनयिक एवं लेखक टी.सी.ए. राघवन ने भाग लिया। सत्र का संचालन संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध प्रभाग की निदेशक प्रियंका चंद्रा ने किया।

