कलयुग का प्रहार: रिश्तों के टूटते धागे और समाज का भविष्य
जयपुर, 19 सितंबर, प्रभात संवाद । आज हम तकनीक के उस दौर में जी रहे हैं, जहां दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से कुछ सेकंड में संपर्क किया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हजारों लोग हमारे साथ जुड़े हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अपने ही घर के लोगों से जुड़े हुए हैं?
एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य कई बार एक-दूसरे से बात करने के लिए समय नहीं निकाल पाते। बातचीत की जगह मोबाइल ने ले ली है, संवेदना की जगह व्यस्तता ने और रिश्तों की जगह कई बार आर्थिक गणनाओं ने।
ऐसे में मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह कलयुग का प्रहार है?
भारतीय चिंतन में कलयुग को केवल एक समयखंड नहीं माना गया, बल्कि इसे नैतिक और सामाजिक मूल्यों के कमजोर होने के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है। जब विश्वास कम होने लगे, संवाद समाप्त होने लगे और रिश्ते भावनाओं की बजाय स्वार्थ से देखे जाने लगें, तब समाज को ठहरकर आत्ममंथन जरूर करना चाहिए।
लेकिन हर समस्या का दोष केवल ‘कलयुग’ पर डाल देना आसान रास्ता है। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—आखिर ऐसी परिस्थितियां पैदा क्यों हो रही हैं?
पैसा जरूरी है, लेकिन क्या पैसा ही सब कुछ है?
आज के जीवन में पैसा जरूरी है। घर चलाने, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की सुरक्षा के लिए आर्थिक मजबूती आवश्यक है। समस्या धन कमाने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब धन जीवन का साधन न रहकर जीवन का उद्देश्य बन जाता है।
बड़ा घर, महंगी गाड़ी, बैंक बैलेंस और सामाजिक प्रतिष्ठा सफलता के प्रतीक बन गए हैं। लेकिन इस दौड़ में कहीं ऐसा तो नहीं कि हम रिश्तों की कीमत भूलते जा रहे हैं?
कई बार परिवार के सदस्य एक-दूसरे के साथ समय बिताने की बजाय अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देते हैं। हम दुनिया भर के लोगों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, लेकिन अपने ही घर में बैठे व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है, यह पूछना भूल जाते हैं।
दूसरों की जिंदगी देखने में हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने लोगों की जिंदगी समझने का समय नहीं बचा।
बच्चों की पढ़ाई के साथ संस्कार भी जरूरी
बच्चे केवल स्कूल और किताबों से नहीं सीखते। उनका पहला विद्यालय परिवार होता है और माता-पिता उनके पहले शिक्षक।
बच्चा घर से ही सीखता है कि बड़ों का सम्मान कैसे करना है, छोटे से प्रेम कैसे करना है, असहमति को कैसे संभालना है, क्रोध पर नियंत्रण कैसे रखना है और कठिन समय में परिवार के साथ कैसे खड़ा रहना है।
आज माता-पिता बच्चों के करियर को लेकर चिंतित हैं। अच्छे स्कूल, अच्छे कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षाएं और बेहतर नौकरी—इन सबकी तैयारी जरूरी है। लेकिन इसके साथ एक और तैयारी जरूरी है—एक अच्छा इंसान बनने की।
यदि बच्चा सफल तो हो जाए, लेकिन रिश्तों का सम्मान करना न सीखे, असफलता को स्वीकार न कर पाए और दूसरों के दुख को समझ न सके, तो शिक्षा अधूरी रह जाती है।
रिश्ते अचानक नहीं टूटते
अधिकांश रिश्ते एक दिन में नहीं टूटते।
उनके पीछे लंबे समय से जमा होती नाराजगी, गलतफहमियां, आर्थिक तनाव, अपेक्षाएं, उपेक्षा और संवाद की कमी होती है।
पति-पत्नी के बीच बातचीत कम होती है। माता-पिता और बच्चों के बीच पीढ़ियों का अंतर बढ़ता जाता है। भाई-बहनों के बीच संपत्ति और अधिकारों को लेकर विवाद शुरू हो जाते हैं।
धीरे-धीरे बातचीत कम होती है और शिकायतें बढ़ती जाती हैं।
फिर एक दिन ऐसा आता है जब लोग कहते हैं—‘रिश्ता तो पहले जैसा ही है, लेकिन अपनापन नहीं रहा।’
यही वह स्थिति है जहां परिवार बाहर से एक दिखाई देता है, लेकिन भीतर से भावनात्मक रूप से कमजोर हो चुका होता है।
हर मतभेद दुश्मनी नहीं होता
परिवार में मतभेद होना असामान्य नहीं है। अलग-अलग उम्र, विचार और परिस्थितियों के कारण असहमति स्वाभाविक है।
समस्या मतभेद में नहीं, बल्कि उसे संभालने के तरीके में है।
यदि बातचीत बंद कर दी जाए, अहंकार को रिश्तों से बड़ा बना दिया जाए और हर विवाद में जीतने की कोशिश की जाए, तो धीरे-धीरे संबंध कमजोर होने लगते हैं।
कई बार किसी समस्या का समाधान बड़ी रकम, महंगे उपहार या किसी बड़े फैसले में नहीं होता। समाधान केवल इतना हो सकता है कि कोई व्यक्ति सामने बैठकर दूसरे की बात बिना बीच में टोके सुन ले।
परिवार को फिर बनाना होगा संवाद का केंद्र
परिवार में रोज कुछ समय ऐसा होना चाहिए जब मोबाइल दूर रखे जाएं और लोग एक-दूसरे के सामने बैठकर बात करें।
बच्चे से केवल यह न पूछा जाए कि—
‘पढ़ाई कैसी चल रही है?’
कभी यह भी पूछा जाए—
‘तुम अंदर से कैसा महसूस कर रहे हो?’
माता-पिता से केवल उनकी जरूरतों के बारे में न पूछा जाए। उनके अकेलेपन और भावनात्मक जरूरतों को भी समझा जाए।
पति-पत्नी केवल घर के खर्च और बच्चों के भविष्य पर बात न करें। एक-दूसरे की परेशानियों और भावनाओं को भी सुनें।
क्योंकि रिश्तों को बनाए रखने के लिए हमेशा बड़े प्रयासों की जरूरत नहीं होती। कई बार थोड़ा समय, थोड़ी संवेदना और थोड़ी बातचीत ही काफी होती है।
तनाव बढ़ रहा है, परिवार सहारा बने
आज व्यक्ति आर्थिक दबाव, रोजगार की चिंता, महंगाई, प्रतियोगिता और सामाजिक अपेक्षाओं से जूझ रहा है।
ऐसे समय में परिवार तनाव बढ़ाने वाली जगह नहीं, बल्कि राहत देने वाली जगह होना चाहिए।
इसके लिए कुछ छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं—
- समस्या को दबाने की बजाय समय रहते बातचीत करें।
- परिवार के हर सदस्य की भावनाओं का सम्मान करें।
- क्रोध में लिए गए फैसलों से बचें।
- आर्थिक और घरेलू जिम्मेदारियों को मिलकर निभाएं।
- बच्चों को केवल सफलता नहीं, संवेदनशीलता भी सिखाएं।
- बुजुर्गों को केवल जिम्मेदारी नहीं, परिवार का अनुभव और भावनात्मक आधार समझें।
- परिवार के लिए समय निकालें।
परिवार को समय देना समय की बर्बादी नहीं, रिश्तों में निवेश है।
क्या किसी समाज का भविष्य खतरे में है?
जब परिवार कमजोर होते हैं, सामाजिक विश्वास कम होता है और व्यक्ति केवल आर्थिक उपलब्धियों से दूसरे व्यक्ति का मूल्यांकन करने लगता है, तो यह किसी भी समाज के लिए चिंता का विषय है।
इसे केवल किसी एक धर्म या समुदाय से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कोई भी अन्य समाज—हर समुदाय की मजबूती उसके मूल्यों, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक जिम्मेदारी और आपसी विश्वास से बनती है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज बचेगा?
सवाल यह होना चाहिए—
हम आने वाली पीढ़ी के लिए कैसा समाज छोड़कर जाना चाहते हैं?
कलयुग को दोष देने से पहले खुद से सवाल
हर दुखद घटना के बाद हम कहते हैं—’आज के जमाने में रिश्ते नहीं रहे।’
लेकिन समाज आखिर बनता किससे है?
हमसे।
यदि हम अपने घर में संवाद बढ़ाते हैं, बच्चों में संवेदनशीलता पैदा करते हैं, बुजुर्गों का सम्मान करते हैं, आर्थिक सफलता के साथ मानवीय सफलता को भी महत्व देते हैं और क्रोध की जगह समझदारी चुनते हैं, तो बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
कलयुग का सबसे बड़ा प्रहार बाहर से नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मानवीय मूल्यों पर होता है।
और उसका उत्तर भी बाहर कहीं नहीं मिलेगा।
वह हमारे अपने घर से शुरू होगा।
अगली पीढ़ी को केवल कमाना नहीं, निभाना भी सिखाएं
आज बच्चों को प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जा रहा है। उन्हें आगे बढ़ना सिखाया जा रहा है। उन्हें जीतना सिखाया जा रहा है।
लेकिन क्या उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि किसी रिश्ते को कैसे बचाया जाता है?
उन्हें कमाना सिखाना जरूरी है, लेकिन बांटना भी सिखाना होगा।
उन्हें अधिकार समझाना जरूरी है, लेकिन जिम्मेदारी भी समझानी होगी।
उन्हें सफलता का अर्थ बताना जरूरी है, लेकिन यह भी बताना होगा कि सफलता के साथ संवेदना न हो तो जीवन अधूरा रह सकता है।
निष्कर्ष: शुरुआत घर से ही होगी
आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय को दोष देने की नहीं है। आवश्यकता है आत्ममंथन की।
हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को केवल बेहतर जीवन देना चाहते हैं या बेहतर समाज भी?
क्योंकि पैसा जीवन को सुविधाजनक बना सकता है, लेकिन रिश्ते ही जीवन को अर्थ देते हैं।
यदि परिवार में संवाद जीवित है, तो उम्मीद जीवित है।
यदि संवेदना जीवित है, तो समाज जीवित है।
यदि मनुष्यता जीवित है, तो सभ्यता जीवित है।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कलयुग कब समाप्त होगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
हम अपने भीतर और अपने परिवार में मानवीय मूल्यों को फिर कब जीवित करेंगे?
समाज का भविष्य केवल बड़ी इमारतों, बाजारों, तकनीक और आर्थिक विकास से तय नहीं होगा। वह हमारे घरों में होने वाली छोटी-छोटी बातचीत, बच्चों को दिए जाने वाले संस्कार और एक-दूसरे के प्रति हमारे व्यवहार से भी तय होगा।
क्योंकि समाज बदलने की शुरुआत हमेशा समाज से नहीं—घर से होती है।
डॉ. सरोज जाखड़
समाजसेवी
(यह लेखक के अपने विचार हैं)
