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ज्योतिष भविष्य बताने की विद्या नहीं, कर्म और संस्कार का बोध कराने वाली ज्ञान परंपरा : पं. राजकुमार शर्मा

सनातन संस्कृति, ज्योतिष और अध्यात्म को तर्क व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने पर दिया जोर
मेरठ, 6 सितंबर। मेरठ स्थित आईआईएमटी यूनिवर्सिटी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन में सद्गुरू आश्रम टोंक के संस्थापक पण्डित राजकुमार शर्मा का ओजस्वी उद्बोधन सम्मेलन का मुख्य आकर्षण रहा। देश-विदेश से आए प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्यों, विद्वानों और आध्यात्मिक चिंतकों की मौजूदगी में गुरुदेव ने भारतीय ज्योतिष परंपरा, सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक चिंतन और राष्ट्र निर्माण को आपस में जुड़ी जीवनदृष्टि बताते हुए समाज को अपनी प्राचीन ज्ञान परंपराओं से जुडऩे का आह्वान किया।
भयभीत करना नहीं, सद्कर्म और आत्मचिंतन की ओर मोडऩा है ज्योतिष का उद्देश्य : अपने संबोधन में पं. राजकुमार शर्मा ने कहा कि ज्योतिष केवल भविष्य बताने या फलकथन की विद्या नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को उसके कर्म, संस्कार और कर्तव्य का बोध कराती है। भारतीय मनीषियों ने ज्योतिष को मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड के गहरे संबंधों को समझने के माध्यम के रूप में विकसित किया था। इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति को डराना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देना है।
अंधविश्वास नहीं, शोध व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरूरत : गुरुदेव ने जोर देकर कहा कि वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद और ज्योतिष जैसी सनातन ज्ञान परंपराओं को अंधविश्वास के चश्मे से देखने के बजाय तर्क, शोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और रिसर्च के जरिए भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों को विश्व पटल पर प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, जिससे युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके।
पारिवारिक संस्कार ही राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला : पारिवारिक मूल्यों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिस घर में संस्कार, अनुशासन, सेवा और अध्यात्म का वातावरण होता है, वहीं से जिम्मेदार नागरिकों और सशक्त समाज का निर्माण होता है। उन्होंने ज्योतिषाचार्यों से आग्रह किया कि वे अपनी भूमिका को केवल व्यक्तिगत भविष्यवाणियों तक सीमित न रखें, बल्कि समाज में सदाचार, पारिवारिक एकता, राष्ट्रभक्ति और मानव कल्याण का माहौल बनाने में योगदान दें।
संस्कारवान नागरिक से ही होगा राष्ट्र कल्याण : गुरुदेव ने अंत में स्पष्ट किया कि राष्ट्र निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि मजबूत सांस्कृतिक चेतना और संस्कारवान नागरिकों से संभव है। सनातन हमारी पहचान है, ज्ञान हमारी शक्ति है, संस्कार हमारी नींव हैं और राष्ट्रसेवा हमारा परम कर्तव्य है। सम्मेलन में उपस्थित देश-विदेश के ज्योतिषाचार्यों और विद्वानों ने गुरुदेव के विचारों की सराहना करते हुए सनातन ज्ञान परंपरा को आधुनिक शोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने पर पूर्ण सहमति व्यक्त की।

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