नवीन भारत के निर्माण की अवधारणा : ऐतिहासिक चेतना से वर्तमान यथार्थ तक
यदि हम ऐतिहासिक दृष्टि से नवीन भारत के निर्माण की ओर झांकें, तो वर्ष 1857 की वह छोटी-सी घटना स्मरण आती है, जिसने संपूर्ण राष्ट्र की चेतना को झकझोर दिया। मंगल पांडे जैसे देशभक्तों ने देश के सम्मान और स्वाभिमान के लिए जिस संघर्ष की शुरुआत की, उसी क्षण भारत में राष्ट्रीयता की भावना का प्रथम सशक्त स्वरूप दिखाई देता है। उस समय राष्ट्रहित सर्वोपरि था जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर। देश के लिए वीरगति को प्राप्त करने वाले शहीदों ने ऐसे भारत का स्वप्न देखा था, जो एक कृषि प्रधान राष्ट्र होने के साथ-साथ अपनी विविधता में एकता के लिए विश्वभर में जाना जाए। उनका सपना था ऐसा भारत, जहाँ प्रत्येक वर्ग के नागरिक को उच्च शिक्षा, रोजगार और संपूर्ण मानवाधिकार प्राप्त हों; जहाँ राजनीति बहुमुखी, शिक्षित और जमीनी नेतृत्व पर आधारित हो; जहाँ नेता देश के प्रत्येक कोने और प्रत्येक नागरिक से जुड़े हों; और जहाँ महिलाएँ, युवा तथा समाज का हर वर्ग समान धरातल से विकास की ओर अग्रसर हो।
परंतु आज यदि हम ऊपर से अपनी भारत माता को निहारते हैं, तो प्रदूषण की काली परछाइयाँ दिखाई देती हैं। इन परछाइयों के भीतर छिपा भारत भ्रष्टाचार, गरीबी और अत्याचारों की व्यथा-कथा चीख-चीखकर कह रही है। आधुनिक भारत की नींव यदि आधार पर आधारित है, तो आज भी गरीबों को रोटी नहीं, महिलाओं को सुरक्षा नहीं और युवाओं को संरक्षण नहीं मिल पा रहा है। इसके विपरीत, धार्मिक भावनाओं के आधार पर नागरिकों को आपस में लड़ाया जा रहा है, ताकि वे सत्ता से प्रश्न न कर सकें।
शिक्षण संस्थान, जो समाज परिवर्तन का आधार होने चाहिए थे, आज केवल औपचारिक दस्तावेज़ तैयार करने की मशीन बनकर रह गए हैं। शैक्षणिक स्तर पर अनुसंधान और नवाचार को हतोत्साहित किया जा रहा है, क्योंकि जागरूक युवा प्रश्न करेगा अपने भविष्य पर, अपने अधिकारों पर, और शासन की जवाबदेही पर। और जब प्रश्न उठेंगे, तो राजनेताओं के पास घोटालों के अतिरिक्त उत्तर देने को बहुत कम रह जाएगा।
यदि युवा पीढ़ी आज भी अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के पतन के साक्षी निराश युवा और धर्मांध समाज होंगे। इस यथार्थ का उदाहरण मैं व्यक्तिगत अनुभव के रूप में देना चाहूँगी। पिछले पाँच वर्षों से मैं ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करवा रही हूँ, परंतु आज तक किसी भी शिकायत पर संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। यही है डिजिटल इंडिया की वास्तविकता।
अतः प्रश्न यह है कि हम उन लोगों को समर्थन क्यों दें, जो खुलेआम देश को लूट रहे हैं? इसमें केवल सत्ता की नहीं, बल्कि हमारी खामोशी की भी बराबर की हिस्सेदारी है।
डॉ. सरोज जाखड़
समाजशास्त्री

