ओपिनियन

विश्व गुरु बनने का सपना और हमारी वास्तविक चुनौतियाँ


जयपुर, 23 फरवरी। आज भारत स्वयं को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने की बात कर रहा है। यह सपना गौरवपूर्ण है, प्रेरणादायक है और हमारी प्राचीन परंपराओं, ज्ञान, संस्कृति तथा आध्यात्मिक विरासत पर आधारित है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम उन मूलभूत समस्याओं का ईमानदारी से सामना कर रहे हैं, जो हमारे समाज की जड़ों को कमजोर कर रही हैं?
हमारे सामने बेरोज़गारी, शिक्षा की असमानता, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सामाजिक अन्याय, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। यदि हम इन पर गंभीर चिंतन करें, तो समाधान भी निकल सकते हैं। परंतु अक्सर हम जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रवाद के विवादों में उलझ जाते हैं। ये विभाजन हमें एकजुट होने से रोकते हैं और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देते हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि कई बार आम जनता स्वयं भी इन विभाजनों को बढ़ावा देती है। बिना गहराई से सोचे-समझे हम भावनाओं में बह जाते हैं और अपने ही हितों के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च शक्ति होती है। यदि समाज जागरूक और विवेकशील होगा, तो कोई भी शक्ति उसे गुमराह नहीं कर सकती। लेकिन यदि हम स्वयं ही संकीर्ण सोच को स्वीकार कर लें, तो हमारा शोषण आसान हो जाता है।
विश्व गुरु बनने का मार्ग केवल तकनीकी प्रगति या आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, नैतिक मूल्यों और विचारों की स्वतंत्रता से प्रशस्त होगा। जब हम जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे, जब हम आलोचनात्मक सोच और संवाद को अपनाएँगे, तभी सच्चे अर्थों में प्रगति संभव होगी।
अतः आवश्यकता है आत्ममंथन की। हमें स्वयं से प्रश्न करना होगा—क्या हम समस्या का हिस्सा हैं या समाधान का? यदि प्रत्येक नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे और जागरूकता के साथ निर्णय ले, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।
डॉ सरोज जाखड़
लेखिका व समाजशास्त्री

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