अब कच्चे तेल के लिए खाड़ी देशों पर निर्भरता होगी खत्म, भारत सरकार ने बनाई योजना
नई दिल्ली,21 मार्च। पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल-अमेरिका के बढ़ते संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शिपिंग बाधाओं को देखते हुए भारत सरकार ने कच्चे तेल आयात की रणनीति में तत्काल बदलाव कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के बीच उच्च-स्तरीय सामंजस्य बिठाया गया है कि क्षेत्रीय स्थिति स्थिर होने तक भारत अपनी 85-88 प्रतिशत आयात निर्भरता को मुख्य रूप से गैर-खाड़ी स्त्रोतों (रूस, अमेरिका, नाइजीरिया, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) से पूरा करने की तरफ बढ़ चला है। इस रणनीति के तहत रूस से 2023-24 की तरह ही बड़े पैमाने पर क्रूड खरीद फिर शुरू हो सकती है। अमेरिका ने हाल ही में 30 दिन की विशेष छूट जारी कर दी है, जिससे रूसी तेल के ‘सी-बॉर्न’ कार्गो की भारत तेजी से खरीद कर रहा है। नाइजीरिया और अंगोला जैसे पश्चिम अफ्रीकी देशों से भी सीधी आपूर्ति बढ़ाने के लिए रिलायंस, एचपीसीएल और अन्य रिफाइनरियां बातचीत कर रही हैं। साथ ही कुछ सौदे भी हो चुके हैं। सरकार के तीनों मंत्रालय इस फैसले को अमल में लाने में सक्रिय हैं। वर्तमान तनाव और अमेरिकी छूट के बाद यह 40 प्रतिशत तक जा सकती है। भारत पहले दर्जन भर देशों से कच्चे तेल खरीदता था आज यह 40 देशों से खरीद रहा है। अप्रैल-नवंबर 2025 में भारत का कुल आयात 17.8 करोड़ टन रहा था जिसमें छह करोड़ टन सिर्फ रूस से था। रूस और अटलांटिक क्षेत्र (अमेरिका, नाइजीरिया) पर ज्यादा निर्भरता से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत तो होगी लेकिन इन क्षेत्रों से तेल भारत तक आने में ज्यादा वक्त लगेगा। रूस से तेल पहुंचने में औसत 15-18 दिन लगते हैं, अमेरिका से 25-31 दिन, जबकि खाड़ी से सिर्फ 4-7 दिन। साथ ही रूस से तेल खरीदने के लिए लंबी दूरी की लागत थोड़ी बढ़ने की संभावना है। इसकी भरपाई के लिए सरकार रूस से अतिरिक्त डिस्काउंट हासिल करके और स्वेज नहर के वैकल्पिक रूट का इस्तेमाल करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बातचीत कर रही है।

