एक नवंबर को बनेगा विशेष रवि और पुष्य योग, धनतेरस-दीपावली से पहले खरीदारी का शुभ योग
जयपुर, 27 अक्टूबर भारतीय ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में पुष्य नक्षत्र का विशेष महत्व माना गया है। पुष्य नक्षत्र को सभी 27 नक्षत्रों में अत्यंत शुभ और कल्याणकारी नक्षत्रों में गिना जाता है। जब पुष्य नक्षत्र रविवार के दिन पड़ता है, तो इसे रवि-पुष्य योग कहा जाता है। इस वर्ष 1 नवंबर को रवि-पुष्य योग का संयोग बन रहा है। धनतेरस और दीपावली से पहले आने वाले इस शुभ अवसर पर खरीदारी, नए कार्यों की शुरुआत और धार्मिक अनुष्ठान करने का विशेष महत्व रहेगा। ज्योतिषाचार्य पंडित ताराचंद शास्त्री के अनुसार, पुष्य नक्षत्र के स्वामी शनि देव हैं, जबकि इसके देवता देवगुरु बृहस्पति माने जाते हैं। बृहस्पति ज्ञान, धर्म, विवेक, समृद्धि और मार्गदर्शन के प्रतीक हैं। वहीं शनि कर्म, अनुशासन, स्थिरता और न्याय से जुड़े हैं। इस कारण पुष्य नक्षत्र को स्थायी लाभ, उन्नति और शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। दीपावली से पहले बाजारों में खरीदारी का विशेष उत्साह रहता है। ऐसे में रवि-पुष्य योग को सोना-चांदी, आभूषण, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और अन्य उपयोगी सामान खरीदने के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस योग में खरीदी गई वस्तुएं सुख-समृद्धि और स्थिरता का प्रतीक होती हैं। व्यापारी वर्ग के लिए भी इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है। नई दुकान या प्रतिष्ठान की शुरुआत, व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय, निवेश की योजना और नए काम का शुभारंभ करने के लिए लोग इस प्रकार के शुभ मुहूर्त को प्राथमिकता देते हैं। शास्त्री के अनुसार वैदिक ज्योतिष में आकाश मंडल को 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। पुष्य इन्हीं में से एक नक्षत्र है। ज्योतिषीय परंपरा में इसे पोषण, उन्नति, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। पुष्य शब्द का संबंध पोषण और विकास से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि इस नक्षत्र को कई शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा जब पुष्य नक्षत्र में गोचर करता है, तब पुष्य नक्षत्र का समय माना जाता है। इस दौरान रविवार का संयोग बनने पर रवि-पुष्य योग कहलाता है। रविवार का संबंध सूर्यदेव से है, जिन्हें ऊर्जा, आत्मविश्वास, प्रतिष्ठा और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। पुष्य नक्षत्र और रविवार का यह मेल धार्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। रवि-पुष्य योग पर श्रद्धालु सूर्यदेव की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करना, मंत्र जाप करना और जरूरतमंदों को दान देना धार्मिक परंपराओं में पुण्यकारी माना जाता है। इसके साथ ही भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और देवगुरु बृहस्पति की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जा सकती है। शनि, चंद्रमा और बृहस्पति का संबंध पुष्य नक्षत्र को शनि देव से संबंधित माना जाता है, जबकि इसके अधिष्ठाता देवता बृहस्पति हैं। ज्योतिषीय परंपरा में शनि को कर्म और अनुशासन तथा बृहस्पति को ज्ञान और धर्म का कारक माना गया है। इन दोनों ग्रहों से जुड़ी मान्यताओं के कारण पुष्य नक्षत्र को ऐसे कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है, जिनमें स्थिरता, धैर्य और दीर्घकालीन लाभ की अपेक्षा हो। हालांकि, प्रत्येक कार्य के लिए शुभता का निर्धारण केवल नक्षत्र से नहीं होता। कार्य की प्रकृति, स्थानीय पंचांग, तिथि और अन्य ज्योतिषीय स्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है।

